अतिक्रमण हटाओ अभियान या पाप धोने की कोशिश? हल्द्वानी मंडी प्रशासन कटघरे में…

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अतिक्रमण हटाओ अभियान के बहाने बेनकाब हुई हल्द्वानी मंडी की सच्चाई, सवालों के घेरे में प्रशासन और संरक्षण तंत्र

की कृषि मंडी समिति इन दिनों अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर चर्चा में है, लेकिन यह अभियान केवल अवैध दुकानों तक सीमित नहीं रह गया है। मंडी परिसर में सामने आ रहे तथ्य मंडी प्रशासन की कार्यप्रणाली, राजनीतिक संरक्षण और वर्षों से चली आ रही चुप्पी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

मामला किसी एक-दो दुकानों की अनियमितता का नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यवस्थित तंत्र का संकेत देता है, जहां नियमों को ताक पर रखकर अवैध साम्राज्य खड़ा किया गया।

बिना अनुमति बनीं 20 दो मंजिला दुकानें

सूत्रों के अनुसार मंडी क्षेत्र में कम से कम 20 दुकानें ऐसी हैं, जिन्हें बिना किसी वैधानिक अनुमति के दो मंजिला बना दिया गया।

  • न नक्शा पास
  • न निर्माण की स्वीकृति
  • न सुरक्षा मानकों का पालन

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मंडी प्रशासन को यह निर्माण दिखाई नहीं दिया, या फिर सब कुछ जानबूझकर नजरअंदाज किया गया?

150 हायर परचेज दुकानें, लेकिन लीज का नामोनिशान नहीं

मंडी परिसर में करीब 150 दुकानें हायर परचेज पर संचालित बताई जा रही हैं, जिनमें से अधिकांश के पास वैध लीज एग्रीमेंट तक नहीं है।
इससे यह सवाल उठता है कि—

  • बिना लीज के दुकानें वर्षों तक कैसे चलती रहीं?
  • मंडी के रिकॉर्ड में ये दुकानें किस आधार पर दर्ज हैं?
  • किराया किस नियम के तहत वसूला गया, या वसूला ही नहीं गया?

100 से अधिक दुकानों ने किया 50 से 100 फीट तक कब्जा

अतिक्रमण का सबसे गंभीर पहलू यह है कि 100 से अधिक दुकानों ने अपनी दुकानों के आगे 50 से 100 फीट तक अवैध कब्जा कर रखा है।
कहीं गोदाम बना लिए गए, कहीं स्थायी शेड खड़े कर दिए गए और कहीं मंडी के खुले रास्तों तक पर कब्जा कर लिया गया—वह भी बिना किसी अनुमति के।

कार्रवाई होते ही विरोध, सवालों में विरोध करने वाले चेहरे

जैसे ही मंडी प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की बात की, विरोध शुरू हो गया।
सूत्रों का दावा है कि विरोध करने वालों में वही लोग सबसे आगे हैं, जिनकी दुकानें नियमों के दायरे में नहीं हैं। इनमें राजनीतिक दलों से जुड़े चेहरे, स्थानीय प्रभावशाली नेता और नियम तोड़ने वाले व्यापारी शामिल बताए जा रहे हैं।

वर्षों से किराया नहीं, तो प्रशासन क्या करता रहा?

यह सबसे बड़ा और असहज सवाल बनकर सामने आया है।
यदि वर्षों से—

  • किराया जमा नहीं हुआ
  • लीज एग्रीमेंट नहीं बने
  • अवैध निर्माण होते रहे

तो मंडी प्रशासन अब तक क्या करता रहा?
क्या यह सब राजनीतिक दबाव में हुआ, या फिर अंदरखाने कोई और ही खेल चलता रहा?

ईमानदार व्यापारी बनाम अवैध कब्जाधारी

मंडी के वे व्यापारी जिन्होंने नियमों का पालन किया, तय सीमा में दुकान रखी और समय पर किराया दिया—आज खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
उनका कहना है कि अवैध अतिक्रमण से न केवल व्यापार प्रभावित हुआ, बल्कि मंडी की छवि भी खराब हुई।
आज जब कार्रवाई की बात हो रही है, तो ईमानदार व्यापारी प्रशासन के साथ खड़े हैं, जबकि अवैध कब्जाधारी विरोध पर उतर आए हैं।

अब अग्निपरीक्षा मंडी प्रशासन की

अब सवाल सिर्फ अतिक्रमण हटाने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है।

  • क्या पुराने मामलों की जांच होगी?
  • क्या वर्षों से किराया न देने वालों से वसूली होगी?
  • क्या अवैध निर्माण कराने वालों पर मुकदमे दर्ज होंगे?

या फिर कुछ नोटिस देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

जनता पूछ रही है जवाब

हल्द्वानी की जनता अब साफ सवाल पूछ रही है—
अगर आज कार्रवाई जरूरी है, तो कल क्यों नहीं थी?
और अगर कल गलत था, तो उसके जिम्मेदार कौन हैं?

मंडी समिति में अतिक्रमण का यह मामला अब केवल दुकानों का नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की असली परीक्षा बन चुका है।

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