रुद्रपुर, 14 अक्टूबर 2025। जिला मुख्यालय रुद्रपुर में मंगलवार को मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. के. के. अग्रवाल की अध्यक्षता में मुख्य चिकित्सा अधिकारी सभागार में एक दिवसीय राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम (National Leprosy Eradication Programme) के तहत एक विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य स्वास्थ्य कर्मियों को कुष्ठ रोग (Leprosy) के लक्षणों की पहचान, उसके उपचार की प्रक्रिया, और समाज में कुष्ठ रोगियों के प्रति सकारात्मक व्यवहार के प्रति जागरूक बनाना था।
कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अग्रवाल के स्वागत उद्बोधन से हुई। उन्होंने बताया कि भारत सरकार और राज्य स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य कुष्ठ रोग का पूर्ण उन्मूलन करना है। इसके लिए आवश्यक है कि स्वास्थ्य कर्मी न केवल रोग की पहचान और उपचार में सक्रिय भूमिका निभाएँ, बल्कि समाज में फैले भ्रम और भेदभाव को समाप्त करने में भी सहयोग करें।


डॉ. अग्रवाल ने प्रशिक्षण में उपस्थित सभी स्वास्थ्य कर्मियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में कुष्ठ रोग से मुक्त हो चुके मरीजों या वर्तमान में उपचाराधीन रोगियों के साथ कोई भी भेदभाव न करें। उन्होंने कहा कि इन रोगियों के साथ मृदुभाषी और संवेदनशील व्यवहार अपनाना चाहिए, जिससे उनका आत्मविश्वास और मनोबल बना रहे। उन्होंने यह भी कहा कि कुष्ठ रोग अब पूरी तरह से उपचार योग्य रोग है, और समय पर पहचान एवं दवा लेने से रोगी पूर्णतः स्वस्थ हो सकता है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने यह भी उल्लेख किया कि समाज में आज भी कुष्ठ रोग को लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ और सामाजिक कलंक मौजूद हैं, जिनके कारण कई बार मरीज उपचार लेने से हिचकिचाते हैं। उन्होंने कहा कि इस कलंक को मिटाना हम सबकी जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य कर्मी घर-घर जाकर लोगों को जानकारी दें कि कुष्ठ रोग का इलाज सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में निःशुल्क उपलब्ध है।
कार्यक्रम में जिला कुष्ठ अधिकारी डॉ. डी. पी. सिंह, लेप्रोसी कंसलटेंट डॉ. रविंद्र पाल सिंह, स्वास्थ्य शिक्षक लाखी राम भट्ट, तथा स्वास्थ्य कुष्ठ पर्यवेक्षक बी. डी. पांडेय द्वारा विस्तृत प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया गया। विशेषज्ञों ने उपस्थित स्वास्थ्य कर्मियों को कुष्ठ रोग के प्रारंभिक लक्षणों जैसे — त्वचा पर सफेद या लाल धब्बे, सुन्नपन, घाव भरने में देरी आदि की पहचान करने के तरीके बताए। साथ ही उन्होंने एमडीटी (Multi Drug Therapy) दवाओं के उपयोग और सही समय पर उपचार शुरू करने के महत्व पर भी प्रकाश डाला।
डॉ. डी. पी. सिंह ने बताया कि यदि कुष्ठ रोग की समय पर पहचान कर उपचार शुरू किया जाए तो यह रोग पूरी तरह नियंत्रित और समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कुष्ठ रोगी सामान्य जीवन जी सकता है और उसके साथ किसी प्रकार का सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए।
डॉ. रविंद्र पाल सिंह ने प्रशिक्षण के दौरान उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कुष्ठ रोग से जुड़ी कई गलत धारणाएँ प्रचलित हैं। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य कर्मियों की जिम्मेदारी है कि वे घर-घर जाकर इस बीमारी के बारे में सही जानकारी दें और लोगों को प्रेरित करें कि वे किसी भी प्रकार के त्वचा संबंधी लक्षण दिखने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में जांच करवाएँ।
स्वास्थ्य शिक्षक लाखी राम भट्ट ने कहा कि जागरूकता ही कुष्ठ उन्मूलन की सबसे बड़ी कुंजी है। स्वास्थ्य कर्मियों को चाहिए कि वे विद्यालयों, ग्राम सभाओं और सामाजिक आयोजनों में जाकर कुष्ठ रोग से संबंधित जानकारी आमजन तक पहुँचाएँ। वहीं स्वास्थ्य कुष्ठ पर्यवेक्षक बी. डी. पांडेय ने कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत अपनाई जाने वाली रिपोर्टिंग प्रक्रिया, सर्वेक्षण पद्धति और रोगी निगरानी व्यवस्था पर विस्तृत जानकारी दी।
कार्यक्रम के समापन पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. के. के. अग्रवाल ने सभी प्रशिक्षुओं से अपेक्षा की कि वे इस प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान को अपने क्षेत्र में व्यवहारिक रूप से लागू करें। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि जिले के हर नागरिक को कुष्ठ रोग से संबंधित सही जानकारी मिले और कोई भी रोगी उपचार से वंचित न रहे।
डॉ. अग्रवाल ने कहा — “कुष्ठ रोग अब कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक सामान्य और पूर्णतः उपचार योग्य बीमारी है। समाज को इसे कलंक नहीं बल्कि जागरूकता के अवसर के रूप में देखना चाहिए।”
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित अधिकारियों ने यह संकल्प लिया कि वे कुष्ठ उन्मूलन मिशन को सफल बनाने के लिए अपने-अपने स्तर पर निरंतर प्रयासरत रहेंगे और समाज में इस रोग से जुड़े मिथकों को समाप्त करने के लिए जनजागरूकता अभियान चलाएंगे।

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