सोशल मीडिया पर वकीलों की मनमानी पर लगाम, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने जारी की नई डिजिटल आचार-संहिता

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नई दिल्ली – डिजिटल युग में विधि व्यवसाय की गरिमा और नैतिक मूल्यों को बनाए रखने के उद्देश्य से बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने अधिवक्ताओं, विधि छात्रों और इंटर्न के लिए नई सोशल मीडिया एवं डिजिटल आचार-संहिता जारी की है। नए दिशा-निर्देशों के तहत सोशल मीडिया पर विज्ञापन, प्रचारात्मक सामग्री, मुवक्किलों को आकर्षित करने वाले पोस्ट और न्यायालय से जुड़े संवेदनशील कंटेंट पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।

बार काउंसिल का कहना है कि इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य तकनीक के उपयोग पर रोक लगाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी अधिवक्ता पेशे की गरिमा, गोपनीयता और नैतिक मानकों का पूरी तरह पालन करें।

विज्ञापन और ‘लीगल इन्फ्लुएंसिंग’ पर सख्ती

नई आचार-संहिता के अनुसार कोई भी अधिवक्ता सोशल मीडिया के माध्यम से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मुवक्किलों को आकर्षित नहीं कर सकेगा। स्वयं को “सर्वश्रेष्ठ वकील” बताना, मुकदमे में जीत की गारंटी देना, ग्राहकों के प्रशंसापत्र (टेस्टिमोनियल) साझा करना या प्रचारात्मक रील्स बनाना व्यावसायिक आचरण के विरुद्ध माना जाएगा।

बार काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि लोकप्रियता बढ़ाने या फॉलोअर्स जुटाने के उद्देश्य से बनाई गई मनोरंजन आधारित कानूनी सामग्री भी पेशे की गरिमा के अनुरूप नहीं मानी जाएगी।

मुवक्किल की गोपनीयता और कोर्ट की गरिमा सर्वोपरि

दिशा-निर्देशों में अधिवक्ताओं को मुवक्किल की पहचान, केस से जुड़े दस्तावेज, गोपनीय बातचीत अथवा अन्य संवेदनशील जानकारी बिना विधिसम्मत अनुमति के साझा करने से सख्ती से रोका गया है।

इसके अलावा न्यायालय की कार्यवाही की फोटो, वीडियो या रिकॉर्डिंग बिना अनुमति के बनाना अथवा सोशल मीडिया पर प्रकाशित करना भी प्रतिबंधित रहेगा।

विधि छात्र और इंटर्न भी होंगे नियमों के दायरे में

बार काउंसिल ने पहली बार इन नियमों का दायरा विधि छात्रों और इंटर्न तक भी बढ़ाया है। अब इंटर्नशिप के दौरान अधिवक्ताओं के चैंबर या न्यायालय परिसर से व्लॉग, रील्स या ‘बिहाइंड द सीन्स’ वीडियो बनाना अनुचित माना जाएगा।

AI का जिम्मेदारी से करना होगा उपयोग

नई नीति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते उपयोग को स्वीकार करते हुए कहा गया है कि AI से तैयार की गई कानूनी सामग्री की तथ्यात्मक शुद्धता और नैतिकता की जिम्मेदारी संबंधित अधिवक्ता की ही होगी। किसी भी प्रकार की भ्रामक या गलत कानूनी जानकारी साझा करना स्वीकार्य नहीं होगा।

नियम तोड़े तो होगी कार्रवाई

बार काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि नए दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अधिवक्ताओं के खिलाफ अधिवक्ता अधिनियम, 1961 और बार काउंसिल नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही नए अधिवक्ताओं और विधि छात्रों के लिए डिजिटल एथिक्स अंडरटेकिंग भी अनिवार्य की गई है।

क्या रहेगा अनुमति के दायरे में?

बार काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि अधिवक्ता अब भी कानूनी जागरूकता, न्यायालयों के महत्वपूर्ण फैसलों का विश्लेषण, विधायी बदलावों की जानकारी और अपनी शैक्षणिक एवं पेशेवर प्रोफाइल साझा कर सकते हैं। हालांकि, इनका उद्देश्य केवल जनजागरूकता और पेशेवर संवाद होना चाहिए, न कि प्रचार या मुवक्किल जुटाना।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया का मानना है कि बदलते डिजिटल दौर में तकनीक का उपयोग आवश्यक है, लेकिन ईमानदारी, गोपनीयता, व्यावसायिकता और न्याय व्यवस्था के प्रति सम्मान जैसे मूल सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

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