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मोर्चरी – कोई भूतिया जगह नहीं, पोस्टमार्टम को लेकर फैली भ्रांतियाँ: सच जानना ज़रूरी…….

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मोर्चरी और पोस्टमार्टम को लेकर समाज में कई तरह की आशंकाएँ और अफवाहें प्रचलित हैं। डर, अज्ञानता और अधूरी जानकारी के कारण इन संवेदनशील प्रक्रियाओं को गलत नजरिये से देखा जाता है। डॉ. सौरभ प्रकाश सिंह, पीजी रेज़िडेंट (फॉरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी), जीएमसी हल्द्वानी ने इन भ्रांतियों पर तथ्यात्मक और वैज्ञानिक स्पष्टता प्रस्तुत की है. ताकि जनता सच समझे और अनावश्यक भय से बचे।

मोर्चरी कोई भूतिया जगह नहीं

मोर्चरी अस्पताल का एक आवश्यक और संवेदनशील विभाग है। यहाँ हर कार्य नियमों, जिम्मेदारी और पूर्ण गंभीरता के साथ किया जाता है। पोस्टमार्टम कोई साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और कानूनी चिकित्सकीय जांच (Medico-Legal Examination) है, जिसका उद्देश्य मृत व्यक्ति की गरिमा बनाए रखते हुए मृत्यु के वास्तविक कारण को स्पष्ट करना है- ताकि न्यायिक प्रक्रिया को तथ्यात्मक आधार मिल सके।

पोस्टमार्टम में चिकित्सकीय टीम की जवाबदेही

पोस्टमार्टम अधिकृत और प्रशिक्षित फॉरेंसिक विशेषज्ञों की टीम द्वारा किया जाता है। बाहरी-आंतरिक परीक्षणों के आधार पर विस्तृत लिखित निष्कर्ष तैयार होते हैं। यदि कारण तुरंत स्पष्ट न हो, तो नमूने/विसरा आगे की वैज्ञानिक जांच के लिए भेजे जाते हैं। कई मामलों में “Cause of Death Pending/Reserved” लिखा जाता है। क्योंकि चिकित्सा विज्ञान में प्राथमिकता जल्दबाज़ी नहीं, सटीकता है।

मजिस्ट्रियल मामलों में पारदर्शिता

मजिस्ट्रियल इनक्वेस्ट वाले मामलों में प्रक्रिया कड़ी निगरानी और पारदर्शिता के साथ होती है। आवश्यकतानुसार वीडियोग्राफी की जाती है और एसडीएम/कार्यपालक मजिस्ट्रेट की उपस्थिति/निगरानी में कार्यवाही सम्पन्न होती है। सभी दस्तावेज़ न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनते हैं – यह एक नियमबद्ध और जवाबदेह प्रक्रिया है।

“अंग निकाल लिए जाते हैं”

यह अफवाह क्यों गलत है

पोस्टमार्टम और अंगदान दो पूरी तरह अलग प्रक्रियाएँ हैं। अंगदान के लिए कानूनी अनुमति, परिजनों की लिखित सहमति, विशेष प्रशिक्षित टीम और नियंत्रित स्टरल व्यवस्था आवश्यक होती है। बिना अनुमति किसी भी अंग का निकालना कानूनन अपराध है। पोस्टमार्टम का उद्देश्य अंग निकालना नहीं, बल्कि मृत्यु के कारण की जांच करना है।

स्वच्छता, रिकॉर्ड और Chain of Custody

पोस्टमार्टम के दौरान मृत व्यक्ति के कपड़े और साथ मौजूद वस्तुओं—घड़ी, जूते, रुमाल, जेब की वस्तुएँ – का विस्तृत लिखित रिकॉर्ड बनाया जाता है और नियमानुसार सुपुर्द किया जाता है। इसे Chain of Custody कहा जाता है, जो आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

संदिग्ध मामलों में नमूने क्यों भेजे जाते हैं

कुछ मामलों में लिवर, किडनी, स्प्लीन, ब्रेन आदि के आवश्यक नमूने FSL या पैथोलॉजी विभाग भेजे जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया सील, हस्ताक्षर, स्टैम्प और दस्तावेज़ीकरण के साथ होती है। अंतिम निष्कर्ष तब तक रोका जाता है, जब तक वैज्ञानिक रिपोर्ट उपलब्ध न हो – ताकि कोई त्रुटि न रहे।

कपड़े काटने को लेकर गलतफहमी

मृत्यु के बाद Rigor Mortis (अकड़न), सूजन या डिकंपोज़िशन के कारण कपड़े सुरक्षित तरीके से उतारना कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में तकनीकी आवश्यकता के तहत कपड़े काटे जाते हैं। इसका उद्देश्य कभी भी असम्मान नहीं होता – यह जांच की सुरक्षा और शुद्धता के लिए किया जाता है।

कोविड काल की अफवाहें-विज्ञान के विरुद्ध भ्रम

कोविड के दौरान यह अफवाह फैली कि अस्पतालों में मृत्यु के बाद अंग निकाल लिए जाते हैं। यह तर्क और चिकित्सा विज्ञान- दोनों के विरुद्ध था। संक्रमण के जोखिम में अंगदान संभव ही नहीं होता – इसके लिए संक्रमण-मुक्त स्थिति, कानूनी सहमति और नियंत्रित स्टरल व्यवस्था अनिवार्य है। ये अफवाहें डर और गलत सूचना का परिणाम थीं।

निष्कर्ष – डर नहीं, समझ और भरोसा

पोस्टमार्टम एक वैज्ञानिक, कानूनी और मानवीय प्रक्रिया है, जो मृत व्यक्ति की गरिमा और चिकित्सा पेशे की मर्यादा का पूर्ण सम्मान करती है। मोर्चरी डर की जगह नहीं – यह सच, विज्ञान और न्याय की खोज का स्थान है। जनता से आग्रह है कि अफवाहों पर नहीं, तथ्यों और संस्थागत प्रक्रियाओं पर भरोसा करें।

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