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अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा उत्तराखंड-बीस साल में आज भी अनेक बिंदु अनछुए

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हल्द्वानी। (आशा शुक्ला) नौ नवंबर दो 2020 को राज्य बने 20 साल पूरे हो चुके हैं और यह 21 वे साल में प्रवेष कर चुका है। राज्य का गठन जिन अवधारणाओं को लेकर हुआ था, उन बिन्दुओं पर उस अनुपात में कार्य नहीं हो पाया जितना होना चाहिए था। पलायन, रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आदि के पिछले बीस साल का रिकार्ड देखा जाये तो इसे कतई संतोषजनक नहीं माना जा सकता है।

ज्ञात हो कि अलग राज्य बनने के अवधारणा में उपरोक्त बिन्दु मुख्य थे। इनको भांपते हुए 1970 के दषक में अविभाजित यूपी के दौरान पहाड़ के पर्वतीय जिलों में विकास के लिए अलग से पर्वतीय विकास मंत्रालय का गठन किया गया था। सोबन सिंह जीना को इसका प्रभार सौंपा गया था। हालाकि यहां से नारायण दत्त तिवारी और हेमवती नंदन बहुगणा यूपी के सीएम रहे लेकिन वे भी यहां की मूलभूत समस्याओं का समाधान करने पर कामयाब नहीं हुए। इधर लंबे संघर्ष के बाद नौ नवंबर दो हजार में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा उत्तराखंड राज्य पर मुहर लगायी गयी। इधर राज्य बनने के बाद लगा था कि यहां पर जो ज्वलंत समस्याओं का समाधान यहां पर पूर्व में पदारूढ़ सरकारें नहीं कर पायी, उसे यहां की भावी सरकारें और जनप्रतिनिधि पूरी करेंगे।

चूंकि राज्य एक विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाला क्षेत्र है। इसलिए यहां की अधिकतर समस्याएं भी विषम ही थी। यहां पर रोजगार मात्र सार्वजनिक क्षेत्र में मिलने की संभावनायें होती है। वह भी सीमित मात्रा में निजी क्षेत्र की कंपनियां या फैक्ट्री आदि न होने से भी युवाओं के समक्ष जो बेरोजगारी का दंष पूर्व से ही था। वह आज भी जारी रहा। यह तो तय है कि सभी लोगों को सरकारी नौकरियां नहीं दी जा सकती। हालाकि युवाओं को नौकरियां नहीं तो स्वावलंबी व स्वरोजगार के लिये प्रेेरित किया जा सकता था। इधर सरकारों का दावा है कि वे अनेक रोजगारपरक योजनाओं का सूत्रपात कर चुके हैं लेकिन कागजी कार्रवाई इतनी थकाउ है कि आम आदमी इन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाता है। वहीं षिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन पर भी धरातलीय स्तर पर योजनाएं मूर्तरूप नहीं ले पायी हैं। वर्तमान सीएम ने पलायन आयोग का गठन तो किया लेकिन आंकड़े गवाह हैं कि राज्य बनने के बाद पलायन को और बढ़ावा मिला है।

 

आशा शुक्ला

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