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ज़कात: इस्लाम का बुनियादी फ़रीज़ा और उसका सही तरीक़ा….

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इस्लामिक रिवायत में ज़कात का महत्व

ज़कात इस्लाम के पाँच अरकान में से एक है और यह हर साहिब-ए-निसाब मुसलमान पर फ़र्ज़ है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करना और दौलत की मुनासिब तक़सीम सुनिश्चित करना है।

मामला विवरण
ज़कात क्या है? इस्लाम का पाँचवां बुनियादी फ़रीज़ा, जो मालदार मुसलमानी पर वाजिब है।
ज़कात किस पर वाजिब है? मुसलमान, आज़ाद, साहिब-ए-निसाब, और एक हिजरी साल गुज़रने के बाद।
निसाब क्या है? वह मिक़दार, जिस पर ज़कात वाजिब होती है (सोना: 87.48 ग्राम, चाँदी: 612.36 ग्राम)
ज़कात की मिक़दार कुल दौलत का 2.5%
ज़कात किस पर दी जाती है? नगदी, सोना, चाँदी, बिज़नेस इन्वेंट्री, शेयर, स्टॉक्स, किराए की प्रॉपर्टी।
ज़कात किन्हें दी जा सकती है? ग़रीब, मोहताज, मिस्कीन, कर्ज़दार, यतीम, मुसाफ़िर, मदरसा तलबा।
ज़कात कब देनी चाहिए? साल में एक बार, एक हिजरी साल पूरा होने पर।
सबसे अच्छा समय रमज़ान में देना ज्यादा सवाब का कारण होता है।
ज़कात देने के फ़ायदे अल्लाह की रज़ा, गुनाहों की माफ़ी, दौलत में बरकत, ग़रीबों की मदद।

 

ज़कात किस पर वाजिब है?
ज़कात हर उस मुसलमान पर वाजिब है जो निम्नलिखित शराइत पूरी करता हो:

वह मुसलमान हो
वह आज़ाद (ग़ुलाम न हो)
उसके पास इतनी दौलत हो जो निसाब से ज़्यादा हो
उस पर एक हिजरी साल (इस्लामी कैलेंडर) गुज़र चुका हो।

निसाब क्या है और किस पर ज़कात वाजिब होती है?

निसाब वह मिक़दार है जिसके बाद ज़कात वाजिब होती है।

सोना: अगर किसी के पास 87.48 ग्राम सोना (या इसकी बराबर नकद राशि) हो तो ज़कात वाजिब है।

चाँदी: अगर किसी के पास 612.36 ग्राम चाँदी (या इसकी बराबर नकद राशि) हो तो ज़कात वाजिब है।

आजकल चाँदी के निसाब को ज़्यादा महत्व दिया जाता है क्योंकि इससे ज़कात का दायरा बढ़ता है।

ज़कात की मिक़दार कितनी होती है?

ज़कात की मिक़दार 2.5% होती है, जो कुल दौलत का एक चवथाई हिस्सा है।

उदाहरण:

अगर किसी के पास ₹1,00,000 की बचत हो और यह निसाब से ज़्यादा हो, तो: ₹1,00,000 × 2.5% = ₹2,500 ज़कात देनी होगी।

ज़कात किन चीज़ों पर दी जाती है?

नगदी (Cash, Bank Balance, Digital Money)

सोना, चाँदी (Gold, Silver)

बिज़नेस इन्वेंट्री (माल-ए-तिजारत)

शेयर और स्टॉक्स

किराए पर दी गई प्रॉपर्टी से होने वाली आमदनी।

ज़कात किसे दी जा सकती है?

ज़कात केवल उन्हीं लोगों को दी जा सकती है जो इसके हक़दार हैं:

ग़रीब और मोहताज

मिस्कीन (बेहद ज़रूरतमंद)

कर्ज़दार (जो कर्ज़ अदा करने में असमर्थ हो)

यतीम (अनाथ बच्चे)

मुसाफ़िर (जो सफ़र में तंगहाली का शिकार हो)

मदरसों और इस्लामी तालीमी इदारों के तलबा

ज़कात कब और क्यों देनी चाहिए?

ज़कात साल में एक बार वाजिब होती है। जब निसाब पूरा हो जाए और एक हिजरी साल गुज़र जाए, तो उसे फ़ौरन अदा करना चाहिए। रमज़ान में ज़कात देना विशेष रूप से ज्यादा सवाब (अज़्र) और पुण्य का कारण होता है, लेकिन इसे तुरंत देना बेहतर है।

 

ज़कात देने के फ़ायदे और अहमियत:

अल्लाह की रज़ा हासिल होती है

गुनाहों की माफ़ी होती है

दौलत पाक और हलाल होती है

माल और दौलत में बरकत होती है

ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद होती है।

क़ुरआन में अल्लाह फरमाता है:

“और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात अदा करो, और जो कुछ भलाई अपने लिए आगे भेजोगे, उसे अल्लाह के पास पाओगे।” (सूरत अल-बक़रा: 110)

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