पंतनगर – उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत में पाए जाने वाले मालू के पौधे का अब वस्त्र निर्माण के क्षेत्र में भी उपयोग हो सकेगा। गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों ने मालू के प्राकृतिक रेशों से पर्यावरण अनुकूल मालू-विस्कोस मिश्रित कपड़ा विकसित किया है। विश्वविद्यालय के इस शोध नवाचार को सितंबर माह में भारत सरकार से पेटेंट भी प्राप्त हो चुका है। इस उपलब्धि को पर्वतीय प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग और टिकाऊ वस्त्र निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यह शोध विश्वविद्यालय के सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की पूर्व पीएचडी छात्रा और वर्तमान में निफ्ट जोधपुर में सहायक प्राध्यापक डॉ. रुचि खोलिया ने महाविद्यालय की अधिष्ठात्री प्रो. अलका गोयल के मार्गदर्शन में किया। शोध के अंतर्गत मालू के रेशों का पृथक्करण कर उन्हें विस्कोस रेयान के साथ मिलाकर एक नवीन मिश्रित कपड़ा तैयार किया गया।
घरेलू साज-सज्जा और वस्त्र उद्योग में होगा उपयोग
डॉ. रुचि खोलिया के अनुसार, मालू के रेशों से तैयार यह मिश्रित कपड़ा घरेलू साज-सज्जा, फर्निशिंग फैब्रिक और टेक्सटाइल उद्योग में टिकाऊ विकल्प के रूप में उपयोगी हो सकता है। अब तक मालू का उपयोग मुख्य रूप से रस्सियां बनाने, पत्तल तैयार करने और प्रसिद्ध कुमाऊंनी मिठाई सिंगौड़ी की पैकिंग में किया जाता रहा है। शोध के माध्यम से इस प्राकृतिक संसाधन के उपयोग का दायरा बढ़ाने की संभावनाएं सामने आई हैं।
उन्होंने बताया कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मालू के रेशों का वैज्ञानिक तरीके से निष्कर्षण और प्रसंस्करण कर उपयोगी वस्त्र उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होने के साथ पर्यावरण अनुकूल वस्त्र निर्माण को भी बढ़ावा मिल सकता है।
ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को मिलेंगे अवसर
डॉ. रुचि खोलिया ने कहा कि मालू के रेशों के निष्कर्षण और प्रसंस्करण पर आधारित लघु एवं कुटीर उद्योग ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन का माध्यम बन सकते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर अपनाया जाता है, तो पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। इससे ग्रामीण आजीविका संवर्धन और पहाड़ों से पलायन की समस्या को कम करने के प्रयासों को भी सहयोग मिलने की संभावना है।
औषधीय उपयोग के लिए भी जाना जाता है मालू
मालू, जिसे अंग्रेजी में कैमल्स फुट क्लाइंबर भी कहा जाता है, का पारंपरिक रूप से विभिन्न कार्यों में उपयोग होता रहा है। डॉ. रुचि के अनुसार, इसके पत्तों और बीजों का भी पारंपरिक उपयोग बताया जाता है। हालांकि, किसी बीमारी के उपचार में इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं।
मालू के रेशों से कपड़ा विकसित करने का यह शोध हिमालयी वनस्पतियों के बहुआयामी उपयोग, हरित प्रौद्योगिकी और टिकाऊ फैशन की दिशा में नई संभावनाएं प्रस्तुत करता है।
अनुसंधान और सामुदायिक सशक्तिकरण को मिलेगा बढ़ावा
पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एसके कश्यप ने इस उपलब्धि को विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रयासों और स्थानीय संसाधनों के सतत उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता, ग्रामीण विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयासरत है।
मालू के रेशों से विकसित इस कपड़े को व्यावसायिक स्तर पर अपनाने की संभावनाएं स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के नए रास्ते खोल सकती हैं।
